सगी बहन निकली धोखेबाज, 3 दिन सड़ती रही एक्ट्रेस की लाश
सगी बहन निकली धोखेबाज, 3 दिन सड़ती रही एक्ट्रेस की लाश
मुंबई । बॉलीवुड की चकाचौंध के पीछे कई सितारों की जिंदगी गहरे अंधेरे से भरी रही है। परदे पर कड़क सास और दमदार विलेन का किरदार निभाने वाली दिग्गज अभिनेत्री ललिता पवार की असल जिंदगी भी कुछ ऐसी ही थी संघर्ष, धोखे और तन्हाई से भरी। करीब 700 फिल्मों में अभिनय करने वाली इस अदाकारा का अंतिम समय बेहद अकेलेपन में बीता।
मंदिर की चौखट पर हुआ जन्म
1916 में महाराष्ट्र के नासिक के पास जन्मीं ललिता पवार का असली नाम अंबिका था। कहा जाता है कि उनकी मां को मंदिर में ही प्रसव पीड़ा हुई और वहीं उनका जन्म हुआ। बचपन से ही उनमें अभिनय का हुनर था और मात्र 9 साल की उम्र में उन्होंने फिल्मों में कदम रख दिया।
9 साल की उम्र में शुरू हुआ करियर
1928 में फिल्म राजा हरिश्चंद्र से उन्होंने अपने फिल्मी सफर की शुरुआत की। साइलेंट फिल्मों से लेकर टॉकीज तक, उन्होंने हर दौर देखा। 1930-40 के दशक में वह एक्शन और पौराणिक फिल्मों में भी नजर आईं।
एक थप्पड़ ने बदल दी किस्मत
1942 में फिल्म जंग-ए-आजादी की शूटिंग के दौरान एक सीन में उनके को-स्टार भगवान दादा को उन्हें थप्पड़ मारना था। शॉट के दौरान थप्पड़ इतना जोरदार पड़ा कि वह बेहोश हो गईं।
इलाज के दौरान हुई लापरवाही के कारण उनके चेहरे पर स्थायी असर पड़ा और दाहिने हिस्से में लकवा हो गया। इस हादसे ने उनके हीरोइन बनने के सपने को तोड़ दिया, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
विलेन और कड़क सास बनकर मिली पहचान
हादसे के बाद उन्होंने किरदार बदले और निगेटिव रोल अपनाए। श्री 420, अनाड़ी, प्रोफेसर, दो रास्ते और आनंद जैसी फिल्मों में उन्होंने यादगार भूमिकाएं निभाईं।
उनकी सख्त सास और चालाक किरदारों ने उन्हें अलग पहचान दी। टीवी के लोकप्रिय धारावाहिक रामायण में ‘मंथरा’ के रोल ने उन्हें घर-घर में मशहूर कर दिया।
निजी जिंदगी में मिला धोखा
ललिता पवार ने निर्माता गणपतराव पवार से शादी की थी, लेकिन बाद में उन्हें पता चला कि उनके पति का संबंध उनकी ही छोटी बहन से है। इस धोखे ने उन्हें तोड़ दिया। बाद में उन्होंने राजप्रकाश गुप्ता से विवाह किया और एक बेटे की मां बनीं।
तीन दिन तक घर में पड़ी रही लाश
1998 में पुणे स्थित अपने बंगले ‘आरोही’ में उन्होंने अंतिम सांस ली। उस वक्त घर में कोई मौजूद नहीं था। पति अस्पताल में थे और बेटा मुंबई में। निधन के बाद तीन दिनों तक उनका शव घर में ही पड़ा रहा। जब फोन का जवाब नहीं मिला तो बेटे ने पुलिस को सूचना दी। दरवाजा तोड़ने पर उनकी मौत का पता चला।
सिनेमा में सात दशक तक राज करने वाली यह अदाकारा जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर अकेली रह गईं। उनकी कहानी इस बात का उदाहरण है कि शोहरत हमेशा सुख नहीं देती कभी-कभी सितारों की जिंदगी का अंत बेहद खामोश और दर्दनाक होता है।







