केंद्र की पहल से सुलझेगा महानदी जल विवाद?

केंद्र की पहल से सुलझेगा महानदी जल विवाद?

केंद्र की पहल से सुलझेगा महानदी जल विवाद?

रायपुर। भारतीय जनता पार्टी की प्रदेश उपाध्यक्ष एवं सांसद रूपकुमारी चौधरी ने ओडिशा और छत्तीसगढ़ के बीच वर्षों से जारी महानदी जल विवाद को केंद्र सरकार की मध्यस्थता से सुलझाने की दिशा में बनी सहमति का स्वागत किया है। उन्होंने इसे दोनों राज्यों के विकास और किसानों के हित में दूरगामी कदम बताया।

चौधरी ने कहा कि महानदी जल विवाद ट्रिब्यूनल (न्यायमूर्ति बेला एस. त्रिवेदी की अध्यक्षता) के समक्ष दोनों राज्यों द्वारा केंद्र की मध्यस्थता पर रजामंदी जताना संवाद से समाधान की दिशा में बड़ा मोड़ है। उन्होंने केंद्रीय राज्यमंत्री तोखन साहू के प्रयासों की सराहना करते हुए बताया कि उनके द्वारा केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल से चर्चा और केंद्रीय जल आयोग के माध्यम से संयुक्त समिति गठित करने के अनुरोध से ही यह संभव हो सका है।

जल्द निकलेगा स्थायी समाधान

सांसद चौधरी ने विश्वास जताया कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण मांझी के बीच होने वाली उच्चस्तरीय बैठक से विवाद का स्थायी समाधान निकलेगा। उन्होंने कहा कि दोनों राज्यों की ''डबल इंजन'' सरकारें और केंद्र का मार्गदर्शन महानदी विवाद का ऐसा सर्वमान्य व न्यायसंगत हल निकालेगा, जिससे दोनों राज्यों की जनता और किसानों का हित सुरक्षित रहेगा।
महानदी जल विवाद: शुरुआत से अब तक की डेटलाइन

वर्ष 1983-1984: छत्तीसगढ़ (तत्कालीन मध्य प्रदेश) द्वारा महानदी बेसिन पर ऊपरी हिस्सों में विभिन्न बैराज और जल परियोजनाओं के निर्माण को लेकर ओडिशा ने आपत्ति जताना शुरू किया।

वर्ष 2016: विवाद ने तब गंभीर रूप लिया जब ओडिशा सरकार ने यह आरोप लगाया कि छत्तीसगढ़ द्वारा गैर-मानसून सीजन में भी अत्यधिक पानी रोके जाने से हीराकुंड बांध में पानी की आवक घट रही है।

वर्ष 2018: मामले के समाधान और कानूनी प्रक्रिया के तहत केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर महानदी जल विवाद न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) का आधिकारिक गठन किया।

वर्ष 2019 से 2023: इस दौरान दोनों राज्यों द्वारा ट्रिब्यूनल के समक्ष अपने-अपने हाइड्रोलॉजिकल आंकड़े, जल उपयोग के दस्तावेज और दावे प्रस्तुत किए गए, लेकिन कानूनी प्रक्रिया लंबी खिंचती चली गई।

वर्ष 2026: अब केंद्र सरकार की सक्रिय मध्यस्थता, संयुक्त समिति के गठन और दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों के बीच उच्चस्तरीय चर्चा की पहल से इस दशकों पुराने विवाद के राजनीतिक व स्थायी समाधान की उम्मीद जगी है।
छत्तीसगढ़ का दावा

छत्तीसगढ़ का स्पष्ट तर्क है कि महानदी बेसिन के अपने भौगोलिक हिस्से में पानी का उपयोग करना उसका वैध और प्राकृतिक अधिकार है। राज्य का कहना है कि वह अपनी कृषि, सिंचाई और बुनियादी पेयजल आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए ही पानी का उपयोग कर रहा है, जिससे निचले इलाकों पर कोई असर नहीं पड़ता।
ओडिशा का दावा

ओडिशा का मुख्य दावा यह है कि छत्तीसगढ़ द्वारा ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में अनियोजित तरीके से बैराज और औद्योगिक परियोजनाएं बनाने से राज्य के प्रसिद्ध हीराकुंड बांध में पानी की आवक खतरनाक रूप से कम हो गई है, जिससे वहां के किसानों की आजीविका और पेयजल संकट गहरा गया है।