49 लाख के इनामी 8 माओवादी कैडरों ने छोड़ी हिंसा
49 लाख के इनामी 8 माओवादी कैडरों ने छोड़ी हिंसा
जगदलपुर। कभी बस्तर के गंगालूर और अबूझमाड़ के जंगल भाकपा (माओवादी) की सबसे बड़ी मानव हथियार तैयार करने वाली फैक्ट्री माने जाते थे। यहीं संगठन के मोबाइल पालिटिकल स्कूल (मोपास) में युवाओं को गुरिल्ला युद्ध, हथियार संचालन और बारूदी सुरंग बिछाने का प्रशिक्षण देकर झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश भेजा जाता था।
अब वही नेटवर्क तेजी से बिखर रहा है। बुधवार को झारखंड में सक्रिय 49 लाख रुपये के इनामी आठ माओवादियों ने बीजापुर में आत्मसमर्पण कर दिया। इनमें तीन डीवीसीएम, चार एसीएम और एक जनमिलिशिया सदस्य शामिल हैं। सभी मूलतः बीजापुर जिले के निवासी हैं और वर्षों से झारखंड में सक्रिय थे।
सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार यह आत्मसमर्पण झारखंड के गिरिडीह में भाकपा (माओवादी) के एक करोड़ रुपये के इनामी पोलित ब्यूरो सदस्य मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी के तुरंत बाद हुआ है।
इससे पहले महासचिव बसव राजू के मारे जाने और शीर्ष नेताओं के संगठन से बाहर होने के बाद बेसरा ही केंद्रीय नेतृत्व का सबसे प्रभावशाली चेहरा बचा था। उसकी गिरफ्तारी के बाद संगठन की केंद्रीय कमान लगभग ध्वस्त मानी जा रही है, जिसका असर अब दूसरे राज्यों में भी दिखाई देने लगा है।
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि लगातार बढ़ते सुरक्षा अभियानों और छत्तीसगढ़ सरकार की पुनर्वास नीति के कारण माओवादी संगठन का जनाधार कमजोर हुआ है। आत्मसमर्पण करने वाले सभी माओवादियों को पुनर्वास नीति के तहत आर्थिक सहायता, कौशल विकास, आवास और स्वरोजगार की सुविधाएं दी जाएंगी।
प्रवक्ता लच्छू बोला- अब खेती-किसानी कर सामान्य जीवन जीऊंगा
झारखंड संगठन में प्रवक्ता की भूमिका निभा रहे लच्छू ने बताया कि वह पिछले 16 वर्षों से माओवादी संगठन से जुड़ा था और वर्ष 2014 से झारखंड में सक्रिय था।
सावनार गांव का रहने वाला लच्छू ने कहा कि गांव के अन्य युवाओं के संगठन में जाने के कारण वह भी माओवादियों के साथ चला गया था। उसने कहा कि अब वह गांव लौटकर खेती-किसानी कर सामान्य जीवन जीना चाहता है।
उसने दावा किया कि झारखंड में अब केवल 15 से 20 माओवादी सक्रिय बचे हैं।आत्मसमर्पण करने वालों में लच्छू समेत रंगा उर्फ सोहन और दोबा माड़वी उर्फ राहत ने भी आत्मसमर्पण किया।
दोनों सरांडा सब-जोनल कमेटी के डीवीसीएम थे और प्रत्येक पर आठ-आठ लाख रुपये का इनाम घोषित था। इसके अलावा कोल्हान एरिया कमेटी की चार एसीएम सदस्य फगनी पोयम उर्फ रजनी, सूरज मुन्नी चम्पिया उर्फ सुबनी, हिड़मे कड़ती उर्फ रीता और बुधरी कुंजाम उर्फ अनुषा ने भी हथियार छोड़ दिए।
इन चारों पर पांच-पांच लाख रुपये का इनाम था। आठवीं सदस्य सलमी चम्पिया उर्फ जिलानी मिसिर बेसरा की सुरक्षा गार्ड के रूप में कार्यरत थी और उस पर भी पांच लाख रुपये का इनाम घोषित था।
इनमें दो डीवीसीएम समेत चार कैडर कभी गंगालूर क्षेत्र में सक्रिय रहे, जिसे सुरक्षा एजेंसियां माओवादी फैक्ट्री के रूप में चिन्हित करती हैं। सभी आठ माओवादियों पर कुल 49 लाख रुपए का इनाम घोषित था।
बस्तर में बचपन के हाथों से किताब छीनकर थमाते थे हथियार
वर्ष 2004 में पीपुल्स वार ग्रुप और माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर के विलय के बाद तत्कालीन महासचिव गणपति ने बस्तर को संगठन का सबसे बड़ा सैन्य प्रशिक्षण केंद्र बनाया।
यहां कम उम्र में युवाओं को गुरिल्ला युद्ध, हथियार संचालन और बारूदी सुरंग बिछाने का प्रशिक्षण देकर मानव हथियार बनाया जाता था।
अबूझमाड़ और दक्षिण बस्तर के जंगलों में तैयार इन कैडरों को झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश भेजा जाता था।
देश की इकलौती पीएलजीए बटालियन भी यहीं गठित की गई थी, जिसकी कमान बाद में हिड़मा ने संभाली। लगातार मुठभेड़ों, गिरफ्तारियों और आत्मसमर्पण के बाद यही प्रशिक्षण तंत्र अब लगभग पूरी तरह बिखर चुका है।
बस्तर में टूटी रीढ़, बिखर गया पूरा कारीडोर
2004 के बाद बस्तर भाकपा (माओवादी) का सबसे मजबूत आधार क्षेत्र बन गया था। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के मार्च 2026 तक माओवादी हिंसा के समूल खात्मे के संकल्प के बाद चलाए गए अभियानों में वर्ष 2024 से अब तक महासचिव बसव राजू, केंद्रीय समिति सदस्य रामचंद्र रेड्डी और कोसा जैसे शीर्ष नेताओं के मारे जाने तथा भूपति, देवजी, रूपेश और सुजाता सहित तीन हजार से अधिक माओवादियों के आत्मसमर्पण से संगठन की सैन्य और वैचारिक क्षमता कमजोर हुई। सुरक्षा एजेंसियों का आकलन है कि बस्तर में संगठन की रीढ़ टूटने के बाद झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में भी उसका प्रभाव तेजी से घटा है।
आंकड़ों में माओवादी नेटवर्क का पतन
- 180 से शून्य जिले: वर्ष 2010 में 10 राज्यों के 180 प्रभावित जिलों का नेटवर्क अब एक भी पूर्ण प्रभावित जिले तक सीमित नहीं रहा।
- 97 प्रतिशत कम हिंसा: माओवादी हिंसा की घटनाओं में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई।
- 95 प्रतिशत कम मौतें: नागरिकों और सुरक्षा बलों के बलिदान के मामलों में भारी कमी आई।
- 550 से अधिक माओवादी ढेर: वर्ष 2024 से अब तक अकेले बस्तर में।
- 3000 से अधिक समर्पण: बड़ी संख्या में माओवादी कैडर मुख्यधारा में लौटे।
- 155 से अधिक सुरक्षा कैंप: अबूझमाड़ समेत अंतिम गढ़ों तक सुरक्षा बलों की पहुंच बनने से माओवादियों की पकड़ लगातार कमजोर हुई।








