भिलाई स्टील प्लांट विवाद पर हाईकोर्ट का फैसला

भिलाई स्टील प्लांट विवाद पर हाईकोर्ट का फैसला

भिलाई स्टील प्लांट विवाद पर हाईकोर्ट का फैसला

बिलासपुरः हाई कोर्ट ने भिलाई स्टील प्लांट द्वारा आयोजित ई-आक्शन में जब्त की गई 10 लाख रुपये की बयाना राशि और जीएसटी वापसी को लेकर दायर याचिका को खारिज कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की युगलपीठ ने कहा कि यह मामला दो पक्षों के बीच संविदा से संबंधित है और विवाद समाधान के लिए मध्यस्थता की व्यवस्था मौजूद है, इसलिए सीधे संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत याचिका स्वीकार नहीं की जा सकती।

मेसर्स कामधेनु ट्रेडिंग कंपनी की प्रोप्राइटर दीप्ति अग्रवाल ने भिलाई स्टील प्लांट के ई-आक्शन में भाग लिया था, जिसमें उसे सफल बोलीदाता घोषित किया गया। फर्म ने 10 लाख रुपये बयाना राशि सहित कुल 22 लाख रुपए जमा किए। हालांकि, 21 मई 2022 को केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने निर्यात शुल्क को 15 फीसदी से बढ़ाकर 50 फीसदी कर दिया, जिससे व्यापार करना असंभव हो गया।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता मो. नकीब ने तर्क दिया कि निर्यात शुल्क में अचानक हुई वृद्धि के कारण बाजार दरें इतनी बढ़ गईं कि व्यापार करना व्यावहारिक रूप से असंभव हो गया। ऐसे में फर्म अनुबंध को पूरा नहीं कर सकी और उसने बीएसपी प्रशासन से रियायत की गुहार लगाई। लेकिन प्लांट प्रबंधन ने 29 जून 2022 को पत्र जारी कर जमा 10 लाख की बयाना राशि और जीएसटी को जब्त कर लिया। भिलाई स्टील प्लांट की ओर से उपस्थित अधिवक्ता डा. सौरभ कुमार पांडे ने याचिका की ग्राह्यता पर कड़ा एतराज जताया।

उन्होंने कोर्ट को बताया कि आनलाइन फारवर्ड आक्शन की शर्तों में स्पष्ट प्रविधान है कि किसी भी संविदात्मक विवाद का निपटारा मध्यस्थता के जरिए किया जाएगा। हाई कोर्ट के पूछने पर याचिकाकर्ता के वकील ने भी स्वीकार किया कि अनुबंध में मध्यस्थता का क्लाज मौजूद है।

मामला अनुंध की शर्त से जुड़ा, मध्यस्थता से ही निर्धारण

हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि जहां दोनों पक्षों ने अनुबंध के तहत विवाद सुलझाने के तंत्र पर सहमति जताई हो, वहां असाधारण संवैधानिक शक्तियों का उपयोग कर याचिका पर विचार नहीं किया जा सकता। निर्यात शुल्क में वृद्धि और बयाना राशि जब्ती का मामला अनुबंध की शर्तों से जुड़ा है, जिसका निर्धारण मध्यस्थता मंच द्वारा ही किया जा सकता है। याचिका खारिज की जाती है, हालांकि याचिकाकर्ता नियमानुसार मध्यस्थता या अन्य कानूनी रास्ता अपनाने के लिए स्वतंत्र है।