देशी गायों से जैविक खाद, खेती में नई सफलता

देशी गायों से जैविक खाद, खेती में नई सफलता

देशी गायों से जैविक खाद, खेती में नई सफलता

बालोद। जिले के गुरुर विकासखंड स्थित ग्राम अरकार के किसान संजय प्रकाश चौधरी ने यह सिद्ध कर दिया है कि विज्ञानी सोच और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता के साथ की गई खेती केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि समाज और पर्यावरण के लिए प्रेरणादायी आंदोलन बन सकती है। वर्ष 1996 में आठ एकड़ भूमि से शुरू की गई उनकी जैविक खेती आज 135 एकड़ में फैले जैव विविधता आधारित प्राकृतिक जैविक कृषि मॉडल के रूप में पहचान बना चुकी है।

संजय चौधरी ने अपने माता-पिता की 600 एकड़ पुश्तैनी भूमि में से केवल आठ एकड़ पर "जहर मुक्त एवं गुणवत्तायुक्त खाद्यान्न उत्पादन" के संकल्प के साथ प्राकृतिक जैविक खेती की शुरुआत की थी। उस समय रासायनिक खेती का दौर तेजी से बढ़ रहा था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। लगातार शोध और नवाचार के बल पर उन्होंने प्राकृतिक जैविक खेती को लाभकारी बना दिया।

जैविक खेती के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए चौधरी को कई प्रतिष्ठित राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से नवाजा जा चुका है। उन्हें वर्ष 2005 में प्रदेश सरकार द्वारा "डा. खूबचंद बघेल कृषक रत्न पुरस्कार" से सम्मानित किया गया था। वर्ष 2018-19 के दौरान उन्हें केंद्र सरकार द्वारा "प्लांट जीनोम सेवियर फार्मर अवार्ड" से गौरववान्वित किया गया।

प्राकृतिक खाद से चमक रही है खेती

संजय चौधरी ने खेती के साथ देशी गौवंश संरक्षण को भी अपनी कृषि प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया है। उनके फार्म में लगभग 60 देशी गायों का पालन किया जाता है। गायों का दूध बेचने के बजाय उससे औषधीय गुणों वाला शुद्ध देसी घी तैयार किया जाता है। गोबर और गौमूत्र का उपयोग जैविक खाद एवं प्राकृतिक कीटनाशक बनाने में किया जाता है। उनकी एक और बड़ी उपलब्धि यह है कि भारत सरकार के पौधा किस्म एवं कृषक अधिकार संरक्षण प्राधिकरण द्वारा धान और मूंग की कई किस्में पंजीकृत की गई हैं।

फसल विविधीकरण से सालभर खेत हरे-भरे

वर्तमान में संजय चौधरी के खेतों में धान, दलहन, तिलहन, हल्दी, स्वीट कार्न, टमाटर, मिर्च, बैंगन, भिंडी, करेला, ग्वार, धनिया, मेथी सहित अनेक सब्जियों और मसालों की खेती की जाती है। फसल विविधीकरण के कारण उनके खेत वर्षभर हरे-भरे रहते हैं। प्राकृतिक खेती को सफल बनाने के लिए वे जैविक संसाधनों पर निर्भर हैं। खेतों में जीवामृत, पंचगव्य, पंचामृत, हरी खाद, नीम खली, करंज खली और सरसों खली का उपयोग किया जाता है। फसलों को कीट एवं रोगों से बचाने के लिए प्राकृतिक काढ़ों का छिड़काव किया जाता है। इससे उत्पादन पूरी तरह रसायन मुक्त और स्वास्थ्यवर्धक रहता है।