नारियल की खेती से बदली तस्वीर, कोंडागांव बना मिसाल

नारियल की खेती से बदली तस्वीर, कोंडागांव बना मिसाल

नारियल की खेती से बदली तस्वीर, कोंडागांव बना मिसाल

रायपुर। बस्तर की पहचान अब सिर्फ महुआ, साल और सागौन तक सीमित नहीं है। कोंडागांव की धरती पर नारियल के पेड़ किसानों के लिए समृद्धि की नई कहानी लिख रहे हैं। कोपाबेड़ा में स्थित नारियल विकास बोर्ड का प्रदर्शन सह बीज उत्पादन (डीएसपी) फार्म इसका जीवंत उदाहरण है। यहां सालभर में डाब नारियल समेत 3,04,954 नारियल का उत्पादन हुआ।

खास बात यह है कि नारियल के पेड़ों के बीच खाली जमीन को भी कमाई का जरिया बनाया गया है। यहां काफी, कोको, काली मिर्च, दालचीनी, आंवला, लीची, आम और अनानास जैसी फसलें उगाई जा रही हैं। अंतरवर्तीय फसलों से फार्म को 7.53 लाख रुपये की अतिरिक्त आय हुई।

बहुफसली खेती का मॉडल

यह माडल बस्तर के किसानों के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि एक ही जमीन से कई फसलों के जरिए आय बढ़ाई जा सकती है। फार्म में तैयार गुणवत्तापूर्ण बीज नट्स और पौधों की मांग दूसरे राज्यों तक पहुंच रही है। 80,090 बीज नट्स चुने गए, जिनमें से 70,790 व्यावसायिक नर्सरी में बोए गए। खेती के साथ रोजगार पर भी जोर है।

निशुल्क प्रशिक्षण से तैयार कर रहे उत्पादक

‘फ्रेंड्स आफ कोकोनट ट्री’ कार्यक्रम में स्थानीय युवाओं और महिलाओं को नारियल कटाई व आधुनिक तकनीकों का निश्शुल्क प्रशिक्षण दिया जा रहा है। बस्तर में नारियल अब फसल से आगे बढ़कर बहुफसली खेती और रोजगार का नया माडल बन रहा है। नारियल विकास बोर्ड से किसानों को लंबी और बौनी किस्म के पौधे 100 रुपये प्रति पौधे, जबकि हाइब्रिड पौधे 250 रुपये प्रति पौधे की दर से उपलब्ध कराए जा रहे हैं। धमतरी, राजनांदगांव समेत प्रदेश के कई जिलों के किसानों ने इन पौधों को अपने खेतों में लगाया है।

एक पेड़, कमाई के कई रास्ते

कोंडागांव फार्म की खासियत सिर्फ नारियल उत्पादन नहीं, बल्कि बहुफसली खेती है। नारियल के पेड़ों के बीच खाली जमीन पर काफी, कोको, काली मिर्च, दालचीनी, आंवला, लीची और अनानास लगाए जा रहे हैं। इससे जमीन का बेहतर उपयोग हो रहा है और किसानों को मुख्य फसल के अलावा अतिरिक्त आय का अवसर मिल रहा है। अंतरवर्तीय फसलों से फार्म ने 7,53,575 रुपये की अतिरिक्त आय अर्जित की है। यह माडल छोटे किसानों के लिए भी उपयोगी साबित हो सकता है।

3 लाख से ज्यादा नारियल की पैदावार

नारियल विकास बोर्ड के कोंडागांव फार्म ने उत्पादन के मामले में भी उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है। सालभर में यहां टेंडर नारियल समेत 3,04,954 नारियल की पैदावार हुई। विज्ञानी कृषि प्रबंधन और कीट नियंत्रण से उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। फार्म का उद्देश्य केवल नारियल उगाना नहीं, बल्कि बस्तर की जलवायु के अनुकूल गुणवत्तापूर्ण पौधे और बीज तैयार करना भी है। यहां तैयार बीज नट्स की आपूर्ति दूसरे राज्यों के फार्मों तक भी की जा रही है।

खेती के साथ युवाओं को कौशल

कोंडागांव का फार्म खेती के साथ स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी तैयार कर रहा है। ‘फ्रेंड्स ऑफ कोकोनट ट्री’ कौशल विकास कार्यक्रम के तहत युवाओं और महिलाओं को नारियल के पेड़ पर चढ़ने, कटाई और आधुनिक तकनीकों का निश्शुल्क व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इससे नारियल बागानों में स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षित श्रमिक उपलब्ध होंगे और युवाओं को रोजगार का नया विकल्प मिलेगा। किसान मेले और प्रशिक्षण कार्यक्रमों से वैज्ञानिक खेती की जानकारी भी किसानों तक पहुंचाई जा रही है।

2,500 नारियल के पेड़ों से लिखी सफलता की कहानी

बस्तर जिले के बकावंड विकासखंड के 36 वर्षीय एमबीए स्नातक किसान ईशांश सिंह राठौर अब नारियल आधारित बहुस्तरीय खेती का उदाहरण बन गए हैं। किसान परिवार से आने वाले ईशांश ने कार्पोरेट क्षेत्र में काम करने के बाद खेती का रुख किया। नारियल विकास बोर्ड, कोंडागांव से तकनीकी मार्गदर्शन लेकर उन्होंने बकावंड में 2,500 नारियल के पेड़ लगाए। इनमें अधिकांश बौनी किस्म के हैं और करीब 500 पेड़ों से उत्पादन शुरू हो चुका है। ईशांश ने नारियल के बागान को केवल एक फसल तक सीमित नहीं रखा।

अनानास, ड्रैगन फ्रूटख् आम और सिट्स के पौधे भी

उन्होंने इसके नीचे 4,000 अनानास, 800 ड्रैगन फ्रूट, 1,000 आम और 600 सिट्रस के पौधे लगाए। इसके साथ केला, अमरूद, पपीता, लीची, काफी, स्ट्राबेरी और मौसमी सब्जियों की खेती भी कर रहे हैं। नारियल से सालाना 5-6 लाख रुपये, जबकि अंतरफसलों से करीब 10 लाख रुपये की अतिरिक्त आय हो रही है। नारियल विकास बोर्ड ने उन्हें 'सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रीय नारियल किसान गैर-पारंपरिक श्रेणी' के तहत राष्ट्रीय नारियल पुरस्कार 2022-24 के लिए चुना है। उन्हें दो सितंबर को तिरुवनंतपुरम में सम्मानित किया जाएगा।